Popular Posts

Saturday, 4 July 2015

देख कलियाँ खिली है कैसे. ..

मनापासून

                        मनापर्यंत. ..!

( वर्ष २रे, अंक ३रा )


“ देख कलियाँ खिली है कैसे. .. ”

ऑनलाइन वाचा (मनापासून मनापर्यंत-अंक ३रा) :
अनुक्रमणिका

देख कलियाँ खिली है कैसे
कल शाम जिसे तूने चूमा था
तेरे लिये या तुझे देखकर
आई है ये फूलों की बरखा?

भीगे बदन से ले अंगड़ाई
पंखुरियाँ मुस्का रही है
इस मौसम को और तन मन को
कैसे यह महका रही है

मैंने पूछा के फूलों से फिर
ये खुशबू लाई हो कहाँ से
उसने कहा उस दिल से
धड़कने तेरी धड़कती है जहाँसे

- विशाल इंगळे

ऑनलाइन वाचा (मनापासून मनापर्यंत-अंक ३रा) :
अनुक्रमणिका

No comments:

Post a Comment