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Saturday, 4 July 2015

तुमसे कई ज्यादा मैंने श्याम को ढलते देखा हैं. ..

मनापासून

                        मनापर्यंत. ..!

( वर्ष २रे, अंक ३रा )


“ तुमसे कई ज्यादा मैंने श्याम को ढलते देखा हैं. .. ”

ऑनलाइन वाचा (मनापासून मनापर्यंत-अंक ३रा) :
अनुक्रमणिका

शमाओं के साथ परवानों को जलते देखा हैं
तुमसे कई ज्यादा मैंने श्याम को ढलते देखा हैं
यूँ बहकाने की तू कोशिश न कर
मोहब्बत की आग में कईओ को झुलसते देखा है
घर जलाके अपना जो
चांदनी के आगोश में आँगन आ बैठे
अँधेरी रात में उनको अकेले
सिसक सिसक के रोते देखा है
न जाने कितनों को फँसाया
अपने जाल में इस छलावें ने
इस मय समंदर से निकलने के लिये
कई शराबियों को तडपते देखा हैं

- विशाल इंगळे

ऑनलाइन वाचा (मनापासून मनापर्यंत-अंक ३रा) :
अनुक्रमणिका

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