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Tuesday, 24 June 2014

है रूह जुदा मुझ से.....

मनापासून

                        मनापर्यंत......

( वर्ष पहिले, अंक पहिला )


है रूह जुदा मुझ से.....

डाउनलोड लिंक (मनापासून मनापर्यंत-अंक पहिला) :
https://docs.google.com/file/d/0B0ZIieqS6P3wd2FkRDFISVRGMUk/edit?usp=docslist_api

ऑनलाइन वाचा (मनापासून मनापर्यंत-अंक पहिला) :
अनुक्रमणिका

इश्क़ के समंदर में कई, कश्तीयाँ डूब जाती है,
न जाने इस राह पे, क्यूँ निकलते है राही?
मंजिल पे गौर करो, तो राहें खो जाती है......
होके भी जुदा तुझसे, मै जुदा न हो सका
बिछड के तुझ से मै, अपना न हो सका
दिन रात दिल में मेरे, तेरी आरज़ू होती है
खुदा से बस्स, तेरे बारे में गुफ़्तगू होती है
ज़िंदगी में मेरे सिर्फ, तेरे प्यार की रियासत है
यूँ तोड दिया दिल क्यूँ, इतनी सी शिकायत है
तेरे बिना आजकल, नींद भी नहीं आती
शराब उतर जाती है, तेरी याद नहीं जाती
हालत मेरी ले आई, क़यामत के आँख आंसू
उस कश्मकश को, किन लफ़्जों में बय़ा करू
सिसकते हुये ओठों से, क़यामत मुझ से बोली
ऐसा शख्स न देखा कभी, जिस्म बिना रूह....
मैं बोला ऐ-क़यामत, हैं दुआ तुझसे
चाहता हूँ जिसे, मिला दे मुझे उससे
जो चाहे, वो क़हर तू ढ़ा ले
व़ोह ही हैं रूह मेरी और रूह जुदा मुझसे.....

© विशाल इंगळे    
 
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